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मुझे पता है कि ये सपने भी छल हैं, और मेरी तमन्नाएँ अधूरी ही रहेंगी…

मुझे पता है कि ये सपने भी छल हैं, और मेरी तमन्नाएँ अधूरी ही रहेंगी…
फिर भी दिल को बहलाने के लिए, कुछ गलतफहमियाँ ज़रूरी ही रहेंगी…

मालूम है कि हकीकत सख़्त है और ख्वाब बिखर जाएँगे,
पर इस वीरान दिल को ज़िंदा रखने को, कुछ भरम निभाने पड़ेंगे…

मुझे मालूम है कि ये ख्वाब भी शायद अधूरे रह जाएँ,
मगर साँसों को चलाने के लिए कुछ वहम ज़रूरी हो जाएँ।

बहुत ख़ूबसूरत पंक्तियाँ हैं… इनमें ज़िंदगी की सबसे बड़ी सच्चाई छुपी है।

इन 6 पंक्तियों में इंसान की पूरी मनोवैज्ञानिक कहानी सिमटी हुई है।

हम जानते हैं कि—
हर सपना पूरा नहीं होता,
हर चाह मुकम्मल नहीं बनती,
हर उम्मीद टूटने के लिए ही पैदा होती है…
फिर भी हम हर सुबह आंख खोलते हैं।

क्यों?

क्योंकि इंसान सच से नहीं,
बल्कि अपनी गलतफहमियों से जिंदा रहता है।

हम मान लेते हैं कि
कल बेहतर होगा,
कोई समझेगा,
कोई रुकेगा,
कोई लौट आएगा…
हालाँकि दिल जानता है — शायद ऐसा कभी न हो।

लेकिन यही “शायद”
हमें टूटने से बचाता है।

अगर इंसान को शुरू में ही पता चल जाए कि
हर रिश्ता अस्थायी है,
हर मंज़िल फिसलन भरी है,
और हर जीत में हार छुपी है —
तो शायद वह चलना ही छोड़ दे।

इसलिए ज़िंदगी ने हमें
थोड़ी सी नादानी,
थोड़ी सी उम्मीद,
और ढेर सारी गलतफहमियाँ दी हैं।

ताकि हम
हर ठोकर के बाद भी कह सकें —
“चलो… एक बार और सही।”

यही गलतफहमियाँ
हमें ज़िंदा नहीं रखतीं,
हमें इंसान बनाए रखती हैं।

Contributed By: Ajay Gautam Advocate: Lawyer / Author / Columnist

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