जबलपुर — जिसे देखा नहीं, महसूस किया जाता है
जबलपुर कोई तस्वीर नहीं,
जो कैमरों में क़ैद हो जाए।
यह तो वह एहसास है,
जो दिल की धड़कनों में उतर जाए।
यह संगमरमर की चट्टानों से पहले,
नर्मदा की लहरों में बसता है।
भोर की पहली सुनहरी किरण संग,
हर प्रार्थना में मुस्कुराता है।
ग्वारीघाट की आरती में,
घंटियों की मधुर पुकार में।
धुआँधार की गर्जन में,
और उसके बाद के शांत विस्तार में।
भेड़ाघाट की उजली चट्टानों से,
अधिक सुंदर उसका मौन है।
जो आँखों से कभी दिखता नहीं,
पर आत्मा में सदा ही गौण है।
यहाँ इतिहास साँसें लेता है,
हर गली, हर चौखट, हर द्वार।
रानी दुर्गावती की वीरता,
अब भी गूँजती है बारंबार।
यह संस्कारधानी यूँ ही नहीं,
सम्मानों से यह नाम मिला।
यहाँ शब्दों ने दीप जलाए,
सेवा ने हर दिल को छुआ।
अब ऊँची इमारतें उठती हैं,
सड़कें चौड़ी होती जाती हैं।
तालाब सिकुड़ते जाते हैं,
मैदानों पर शहर बसा है।
फिर भी कोई नया मुसाफ़िर,
नर्मदा किनारे ठहर जाता है।
धीरे-धीरे इस शहर का,
अनकहा प्रेम समझ पाता है।
वह कहता है—
यहाँ की हवा कुछ अलग है,
यहाँ की शामों में सुकून है।
यह शहर भागता नहीं,
यहीं इसकी सबसे बड़ी धुन है।
जबलपुर इमारतों में नहीं,
रिश्तों की गर्माहट में बसता है।
पहली बारिश की मिट्टी में,
माँ नर्मदा की आहट में बसता है।
यह मंदिरों की आरती है,
नाविक का मधुर गीत है।
बचपन की गलियों की हँसी है,
हर दिल का अतीत है।
शहर बदलेंगे, समय बदलेगा,
रूप नया हर बार होगा।
पर जो नर्मदा से प्रेम करेगा,
वही जबलपुर का हक़दार होगा।
क्योंकि जबलपुर का असली सौंदर्य,
आँखों से कभी दिखाई नहीं देता।
उसे महसूस करना पड़ता है—
हर साँस में, हर स्मृति में, हर प्रार्थना में।
जबलपुर कोई स्थान नहीं,
एक अनुभूति है।
जिसे देखा नहीं जाता—
सिर्फ़ महसूस किया जाता है।
By Ajay Gautam
