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कभी बिना टूटा इंसान देखा है?

कभी बिना टूटा इंसान देखा है?

मैंने नहीं देखा।

मैंने देखे हैं मुस्कुराते चेहरे,
महफ़िलों में ठहाके लगाते लोग,
अपने कंधों पर दुनियाभर की जिम्मेदारियाँ ढोते हुए आदमी,
और हर दर्द को चुप्पी में सीती हुई औरतें।

पर मैंने कभी ऐसा इंसान नहीं देखा,
जिसकी आत्मा पर
समय ने कोई दरार न डाली हो।

टूटना इंसानी फितरत है।

जैसे नदी का किनारा कटता है,
जैसे पहाड़ सदियों की बारिश में घिसते हैं,
जैसे वृक्ष पतझड़ में अपने ही पत्तों को खो देता है,
वैसे ही मनुष्य भी
किसी न किसी मौसम में
अपने भीतर कुछ खो देता है।

कोई प्रेम में टूटता है,
कोई अपनों के बिछड़ जाने से।

कोई उस सपने के मर जाने पर टूटता है
जिसे उसने वर्षों तक
अपने सीने में धड़कते हुए महसूस किया था।

कोई अपनी असफलताओं के नीचे दबकर,
तो कोई अपनी सफलताओं के शोर में अकेला पड़कर टूटता है।

और अजीब बात यह है कि
दुनिया अक्सर उसके टूटने का दिन नहीं देख पाती।

क्योंकि वह बाहर से नहीं टूटता।

उसकी आँखें वैसी ही रहती हैं,
उसकी चाल वैसी ही रहती है,
उसकी आवाज़ में भी
शायद कोई कंपन नहीं आता।

वह अगले दिन भी काम पर जाता है,
लोगों से हाथ मिलाता है,
बच्चों को हँसाता है,
घरवालों का हाल पूछता है।

पर उसी समय,
उसके भीतर कुछ ऐसा बिखर चुका होता है
जिसे वह स्वयं भी समेट नहीं पा रहा होता।

अंदर टूटने की कोई आवाज़ नहीं होती।

न कोई धमाका,
न कोई चीख,
न कोई गिरता हुआ मलबा।

बस एक खामोशी होती है,
जो धीरे-धीरे
दिल के किसी कोने में घर बना लेती है।

और फिर इंसान सीख जाता है
अपने टूटे हुए हिस्सों के साथ जीना।

वह अपने घावों पर
कपड़े नहीं,
मुस्कानें बाँधता है।

वह अपने आँसुओं को
आँखों से नहीं,
व्यस्तताओं से छुपाता है।

वह लोगों के बीच रहता है,
पर अपने दर्द के साथ अकेला बैठता है।

कई बार तो ऐसा भी होता है
कि उसे खुद याद नहीं रहता
कि वह कब टूटा था।

बस इतना महसूस होता है
कि अब पहले जैसा कुछ नहीं रहा।

जैसे किसी पुराने घर की दीवार में
एक महीन सी दरार पड़ जाए,
और घर फिर भी खड़ा रहे।

इंसान भी ऐसे ही खड़ा रहता है।

दुनिया उसे मजबूत कहती है,
जबकि उसकी मजबूती का सच यह होता है
कि वह टूटने के बाद भी
खड़ा रहना सीख गया है।

शायद साहस का अर्थ कभी न टूटना नहीं है।

साहस तो यह है कि
टूटकर भी प्रेम करना,
बिखरकर भी सपने देखना,
हारकर भी उम्मीद बचाए रखना।

क्योंकि सच यही है—

हर इंसान
कभी न कभी,
कहीं न कहीं,
अंदर से जरूर टूटता है।

वो आदमी हो या औरत,
गरीब हो या अमीर,
मजबूत दिखता हो या कमजोर।

कुछ एक बार टूटते हैं,
कुछ बार-बार।

कुछ दरारों को भर लेते हैं,
कुछ उन्हें उम्रभर अपने साथ लेकर चलते हैं।

मगर टूटता हर कोई है।

और शायद इसी टूटन में
हमारी इंसानियत छुपी है।

क्योंकि जो कभी टूटा ही नहीं,
वह दर्द को क्या समझेगा?

और जो दर्द को नहीं समझता,
वह प्रेम, करुणा और संवेदना की
असली भाषा कैसे जानेगा?

इसलिए जब अगली बार
कोई मुस्कुराता हुआ चेहरा दिखे,

तो यह मत मान लेना
कि उसकी दुनिया बिल्कुल सलामत है।

हो सकता है
वह अपनी सबसे बड़ी लड़ाई जीतकर आया हो।

हो सकता है
वह अपने टूटे हुए हिस्सों को
आज भी चुपचाप जोड़ रहा हो।

और हो सकता है—

उसकी मुस्कान,
उसके टूट जाने के बाद
बचा हुआ सबसे सुंदर अवशेष हो।

By Ajay Gautam

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