प्यार में शक की कोई गुंजाइश नहीं होती,
और यही भरोसा दगा देने की छूट देता है।
शक करते तो शायद रिश्ता बचा लेते हम,
यक़ीन किया, इसलिए ख़ुद को हार बैठे।
मोहब्बत में भरोसा करना गुनाह तो नहीं था,
बस अफ़सोस इतना है—सज़ा वफ़ादार को मिली।
भरोसा रखो तो अक्सर लोग कमज़ोर समझ लेते हैं,
दिल साफ़ हो तो लोग उसमें रास्ते निकाल लेते हैं।
हमने तो मोहब्बत में हिसाब रखा ही नहीं,
उसे हर झूठ का जवाब देना भी ज़रूरी नहीं लगा।
जिसे अपना समझकर राज़-ए-दिल सौंप दिया,
उसी ने बाज़ार में हमारी ख़ामोशी बेच दी।
वफ़ा की उम्मीद भी अजीब चीज़ है साहब,
जिससे रखते हैं, वही इम्तिहान लेता है।
हमने उसकी हर बात को सच मान लिया,
वो हमारी इसी आदत का फ़ायदा उठाता रहा।
शक होता तो शायद दूरियाँ पहले ही दिख जातीं,
मोहब्बत थी, इसलिए हर धोखा अपना लगा।
दगा देने वाले को इल्ज़ाम क्या देना,
हम ही थे जो उसे ख़ुद से ज़्यादा मान बैठे।
प्यार में शक की कोई गुंजाइश नहीं होती,
और यही बात दगा देने की छूट देती है।
By Ajay Gautam
