गर तू है तो मुझमें अपना वजूद छीन ले,
उम्र बीत गई दिल को यक़ीन दिलाते हुए।
तू सामने था फिर भी तुझे पा न सके हम,
कुछ फ़ासले थे जो उम्र से भी लंबे निकले।
तू मुझमें रहा और मुझे ख़बर भी न हुई,
मैं उम्र भर अपने ही होने का यक़ीन करता रहा।
तेरे होने का यक़ीं दिल को दिलाते रहे हम,
और दिल था कि हर बार सवाल करता रहा।
अगर मोहब्बत है तो मुझसे मेरा मैं ले ले,
बहुत थक गया हूँ ख़ुद को सँभालते हुए।
तू मिला भी तो ऐसे जैसे ख़्वाब मिला हो,
आँख खुलती रही और उम्र गुज़रती रही।
मैंने हर बार तुझे ख़ुद में तलाशा है मगर,
तू ही बता, मेरा वजूद तुझसे अलग कहाँ है।
गर तू है तो मेरी रूह में उतरकर देख,
मैं उम्र भर तुझे अपना समझता रहा हूँ।
गर तू मेरा है तो फिर मुझसे पर्दा कैसा,
दिल को कब तक बहलाऊँ तेरे होने का यक़ीं दिलाते हुए।
By Ajay Gautam
