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सफल होना है तो जुआरी का कलेजा, शराबी की लगन और चोर जितना धैर्य चाहिए

सफल होना है तो जुआरी का कलेजा, शराबी की लगन और चोर जितना धैर्य चाहिए

जोखिम उठाने का साहस, लक्ष्य के पीछे पागलपन जैसी निरंतरता और सही वक्त आने तक चुपचाप इंतजार करने की कला।

“सफल होना है तो जुआरी का कलेजा, शराबी की लगन और चोर जितना धैर्य चाहिए”—पहली नज़र में यह वाक्य उकसाने वाला, बल्कि कुछ हद तक गलत भी लग सकता है। जुआ, शराब और चोरी जैसी प्रवृत्तियाँ अपने वास्तविक रूप में सफलता के आदर्श नहीं हो सकतीं। लेकिन इस वाक्य के भीतर छिपे रूपक को समझें तो यह मनुष्य की तीन असाधारण मानसिक क्षमताओं की ओर संकेत करता है—जोखिम उठाने का साहस, लक्ष्य के प्रति असाधारण निरंतरता और सही अवसर आने तक धैर्यपूर्वक प्रतीक्षा करने की क्षमता। सफलता अक्सर प्रतिभा से कम और इन तीन मानसिक शक्तियों के संतुलन से अधिक बनती है। शोध भी इस बात की ओर संकेत करता है कि उद्यमिता और दीर्घकालिक उपलब्धियों में जोखिम की प्रवृत्ति, दृढ़ता और लक्ष्य पर टिके रहने की क्षमता महत्वपूर्ण भूमिका निभाती हैं। 2026 के एक शोध में जोखिम लेने की प्रवृत्ति को उद्यमिता में प्रवेश और उसे लंबे समय तक बनाए रखने का सबसे मजबूत पूर्वानुमानक पाया गया, जबकि अन्य सामाजिक-भावनात्मक गुणों का प्रभाव अपेक्षाकृत छोटा और असंगत था।

यहाँ “जुआरी का कलेजा” जुआ खेलने की सलाह नहीं है; यह उस मानसिक साहस का प्रतीक है जिसमें व्यक्ति अनिश्चित परिणाम के बावजूद सोच-समझकर जोखिम लेने को तैयार रहता है। अधिकांश लोग निश्चितता के इंतज़ार में अपनी पूरी जिंदगी निकाल देते हैं। वे तब कदम उठाना चाहते हैं जब असफलता की संभावना लगभग समाप्त हो जाए, जब रास्ता साफ दिखाई दे, जब दूसरे लोग भी उसी रास्ते पर चल रहे हों और जब परिणाम की गारंटी मिल जाए। समस्या यह है कि वास्तविक जीवन में ऐसे अवसर बहुत कम आते हैं। व्यवसाय शुरू करना हो, नया करियर चुनना हो, किसी कठिन परीक्षा की तैयारी करनी हो, रचनात्मक काम शुरू करना हो या अपनी पुरानी पहचान से बाहर निकलना हो—हर महत्वपूर्ण निर्णय में कुछ अनिश्चितता होती है। सफलता का साहस यह नहीं है कि व्यक्ति हर जोखिम उठा ले; बल्कि यह है कि वह जोखिम और लापरवाही के बीच का अंतर समझे और संभावित नुकसान को स्वीकार करते हुए ऐसा जोखिम चुने जिसका संभावित लाभ उसके लिए पर्याप्त मूल्यवान हो।

उद्यमिता पर उपलब्ध शोध भी जोखिम को अकेली शक्ति के रूप में नहीं देखता। जोखिम लेने की क्षमता तब अधिक उपयोगी होती है जब उसके साथ निर्णय की समझ और लगातार प्रयास जुड़ा हो। एक शोध समीक्षा में उद्यमी की persistence यानी कठिनाइयों और अनिश्चित परिस्थितियों के बावजूद प्रयास जारी रखने की क्षमता को उद्यमिता की सफलता और व्यक्तिगत विकास के लिए महत्वपूर्ण बताया गया है। दूसरे शब्दों में, केवल जोखिम लेने वाला व्यक्ति सफल नहीं होता; वह व्यक्ति आगे बढ़ता है जो जोखिम लेने के बाद उसके परिणामों का सामना करने, उनसे सीखने और आवश्यकता पड़ने पर अपनी रणनीति बदलने के लिए भी तैयार रहता है। यही कारण है कि साहस और मूर्खता के बीच एक महीन लेकिन निर्णायक रेखा होती है। साहस कहता है, “मैं जोखिम समझता हूँ और फिर भी आगे बढ़ूँगा।” मूर्खता कहती है, “मैंने जोखिम समझने की जरूरत ही नहीं समझी।”

अब इस वाक्य के दूसरे हिस्से पर आइए—“शराबी की लगन।” यहाँ भी बात शराब की नहीं, बल्कि किसी चीज़ के पीछे लगातार लगे रहने की अतिशयोक्तिपूर्ण मिसाल की है। जिस प्रकार किसी व्यक्ति की आदत उसके व्यवहार को बार-बार उसी दिशा में धकेल सकती है, उसी प्रकार सफलता के लिए भी लक्ष्य की ओर बार-बार लौटने की क्षमता चाहिए। महान उपलब्धियाँ अक्सर किसी एक असाधारण दिन में नहीं बनतीं। वे उन सैकड़ों साधारण दिनों में बनती हैं जिनमें कोई तालियाँ नहीं बजाता, कोई पुरस्कार नहीं मिलता और परिणाम दिखाई नहीं देता। व्यक्ति फिर भी काम करता रहता है। फिर अगले दिन करता है। फिर असफलता के बाद करता है। फिर आलोचना के बाद करता है। और कई बार तब भी करता है जब उसे खुद संदेह होने लगता है कि वह कभी सफल होगा या नहीं।

मनोविज्ञान में इस गुण को grit, perseverance और self-control जैसे अलग-अलग विचारों से समझने की कोशिश की गई है। शोध में grit को किसी महत्वपूर्ण और चुनौतीपूर्ण लक्ष्य की ओर लंबे समय तक लगातार प्रयास करने की क्षमता के रूप में और self-control को तत्काल आकर्षणों या प्रलोभनों के बावजूद अपने व्यवहार को महत्वपूर्ण लक्ष्य के अनुरूप रखने की क्षमता के रूप में अलग किया गया है। दोनों एक-दूसरे से जुड़े हैं, लेकिन एक ही चीज़ नहीं हैं। इसका अर्थ बहुत महत्वपूर्ण है। किसी लक्ष्य के प्रति जुनून होना पर्याप्त नहीं है; आपको अपनी इच्छाओं, आलस्य, मनोरंजन, भय और तत्काल सुखों को भी नियंत्रित करना पड़ता है। लक्ष्य की आग आपको आगे ले जाती है, लेकिन आत्म-नियंत्रण आपको रास्ते से भटकने से बचाता है।

फिर आता है तीसरा और शायद सबसे कम समझा जाने वाला गुण—“चोर जितना धैर्य।” चोरी के संदर्भ में यह भी एक रूपक है, न कि किसी अवैध व्यवहार का समर्थन। इसका आशय उस व्यक्ति की तरह चुपचाप प्रतीक्षा करने से है जो जल्दबाजी में अपनी उपस्थिति प्रकट नहीं करता और सही क्षण का इंतज़ार करता है। सफलता की दुनिया में यह गुण अत्यंत शक्तिशाली है क्योंकि हर अवसर तुरंत फल नहीं देता। कुछ बीजों को मिट्टी के भीतर लंबे समय तक रहना पड़ता है। कुछ व्यवसायों को ग्राहक मिलने में वर्षों लगते हैं। कुछ कौशलों को इतना विकसित होने में समय लगता है कि शुरुआती महीनों में व्यक्ति को अपने भीतर कोई विशेष परिवर्तन दिखाई ही नहीं देता। जो व्यक्ति हर बार परिणाम न मिलने पर दिशा बदल देता है, वह अक्सर किसी भी दिशा में पर्याप्त दूरी तय नहीं कर पाता।

धैर्य का अर्थ निष्क्रिय बैठना भी नहीं है। असली धैर्य सक्रिय होता है। व्यक्ति बाहर से शांत दिखाई देता है, लेकिन भीतर लगातार तैयारी कर रहा होता है। वह सीख रहा होता है, अपनी गलतियों को समझ रहा होता है, संसाधन जुटा रहा होता है, संबंध बना रहा होता है, अवसरों को पहचान रहा होता है और अपनी रणनीति सुधार रहा होता है। फिर जब परिस्थितियाँ अनुकूल होती हैं, वह उस अवसर को पकड़ने के लिए तैयार होता है। उद्यमिता पर शोध में भी यह संकेत मिलता है कि सफल उद्यमियों की पिछली सफलता और market timing जैसी क्षमता भविष्य के प्रदर्शन से जुड़ी हो सकती है। इसलिए कई बार सफलता केवल यह नहीं होती कि कौन सबसे तेज़ दौड़ा; यह भी होती है कि कौन सही समय पर सही दिशा में दौड़ा।

लेकिन यहाँ एक बड़ा भ्रम दूर करना जरूरी है। धैर्य का अर्थ यह नहीं कि किसी भी लक्ष्य के पीछे अनंत समय तक आँखें बंद करके लगे रहो। वास्तविक दुनिया अनिश्चित है और भविष्य का परिणाम हमेशा निश्चित नहीं होता। शोध में यह भी पाया गया है कि जब किसी भविष्य के परिणाम के आने का समय अनिश्चित हो, तो कुछ परिस्थितियों में लगातार प्रतीक्षा करना हमेशा तर्कसंगत रणनीति नहीं होती; व्यक्ति को यह भी आकलन करना पड़ता है कि इंतज़ार की वास्तविक लागत क्या है और लक्ष्य प्राप्त होने की संभावना कितनी बची है। इसलिए सफल व्यक्ति जिद्दी नहीं, बल्कि रणनीतिक रूप से धैर्यवान होता है। वह लक्ष्य से प्रेम करता है, लेकिन अपनी वर्तमान रणनीति से अंधा प्रेम नहीं करता।

यही अंतर “पागलपन जैसी निरंतरता” को भी समझाता है। दुनिया में दो प्रकार की जिद होती है। पहली जिद वह है जिसमें व्यक्ति बार-बार असफल होने के बाद भी वही गलती दोहराता रहता है। दूसरी जिद वह है जिसमें व्यक्ति लक्ष्य नहीं छोड़ता, लेकिन रास्ता बदलने के लिए तैयार रहता है। पहली जिद अहंकार है; दूसरी दृढ़ता। अगर कोई व्यक्ति दस बार कोशिश करके दसों बार बिल्कुल वही गलती करता है, तो उसकी निरंतरता प्रशंसा योग्य नहीं है। लेकिन अगर वह हर असफलता से सीखता है, रणनीति बदलता है और फिर उसी बड़े उद्देश्य की ओर लौटता है, तो यही persistence उसे दूसरों से अलग करती है। उद्यमिता पर शोध में persistence को इसी व्यापक संदर्भ में महत्वपूर्ण माना गया है।

सफलता के लिए इसलिए केवल “जोखिम लेने” की क्षमता नहीं चाहिए, बल्कि calculated risk की मानसिकता चाहिए। व्यक्ति को यह पूछना चाहिए कि सबसे बुरा क्या हो सकता है, उस नुकसान को मैं कितना सह सकता हूँ, संभावित लाभ क्या है, मेरे पास कौन-सी जानकारी उपलब्ध है और अगर पहली कोशिश असफल हुई तो अगला कदम क्या होगा। साहस का सबसे परिपक्व रूप अंधी छलांग नहीं बल्कि जानकारी के आधार पर अनिश्चितता को स्वीकार करना है। एक व्यक्ति जोखिम से पूरी तरह बचकर सुरक्षित रह सकता है, लेकिन उसी सुरक्षा की कीमत यह भी हो सकती है कि वह कभी ऐसी जगह पहुँचे ही नहीं जहाँ असाधारण अवसर मौजूद हों।

इसी तरह निरंतरता का सबसे परिपक्व रूप दिन-रात काम करते रहना नहीं है। लगातार थककर टूट जाना perseverance नहीं है। असली निरंतरता ऐसी व्यवस्था बनाना है जिसमें व्यक्ति लंबे समय तक अपने लक्ष्य की दिशा में काम कर सके। लक्ष्य को छोटे कार्यों में बाँटना, प्रगति को मापना, अपनी ऊर्जा का प्रबंधन करना और काम में ऐसा अर्थ या तत्काल संतोष खोजना जो व्यक्ति को रोज़ वापस खींच लाए—ये सभी चीजें महत्वपूर्ण हैं। एक अध्ययन में दीर्घकालिक लक्ष्यों के संदर्भ में पाया गया कि तत्काल मिलने वाला आनंद या reward कई परिस्थितियों में केवल भविष्य के बड़े पुरस्कार की तुलना में वास्तविक persistence का बेहतर संकेतक था। इसका सरल अर्थ है कि यदि आप चाहते हैं कि कोई व्यक्ति वर्षों तक किसी लक्ष्य पर काम करता रहे, तो केवल यह कहना पर्याप्त नहीं कि “एक दिन बहुत बड़ा परिणाम मिलेगा।” उसे आज के काम में भी कोई अर्थ, संतोष, प्रगति या उपलब्धि महसूस होनी चाहिए।

और फिर आती है चुप्पी। “सही वक्त आने तक चुपचाप इंतज़ार करने” की कला आज के समय में पहले से अधिक कठिन हो गई है। सोशल मीडिया ने लोगों को यह आदत डाल दी है कि हर कदम सार्वजनिक होना चाहिए। नई योजना बनाते ही घोषणा, थोड़ा काम होते ही प्रदर्शन, छोटी उपलब्धि मिलते ही प्रचार और असफलता आते ही स्पष्टीकरण। लेकिन कई महान कामों को शुरुआती अवस्था में शोर नहीं, एकांत चाहिए। जब आप हर किसी को अपनी योजना बताते हैं, तो कई बार आपको वास्तविक काम से अधिक उस योजना की छवि बनाए रखने में ऊर्जा लगने लगती है। इसके विपरीत, शांत व्यक्ति अपना ध्यान बाहरी मान्यता से हटाकर वास्तविक प्रगति पर लगा सकता है।

चुप्पी का अर्थ डरना नहीं है। चुप्पी रणनीति है। जब आपके पास कोई बड़ा लक्ष्य हो, तो हर आलोचक को जवाब देना आवश्यक नहीं। हर संदेह का खंडन करना आवश्यक नहीं। हर व्यक्ति को अपनी योजना समझाना आवश्यक नहीं। कभी-कभी सबसे मजबूत उत्तर परिणाम होता है। जो व्यक्ति लगातार अपने काम को सुधारता रहता है, उसे अंततः अपने बारे में बोलने की आवश्यकता कम पड़ती है। उसकी उपलब्धि उसके स्थान पर बोलती है।

फिर भी इस पूरे विचार में एक सावधानी बहुत आवश्यक है। “जुआरी का कलेजा” अगर अंधे जोखिम में बदल जाए, “शराबी की लगन” अगर विनाशकारी लत की तरह लक्ष्यहीन जुनून बन जाए और “चोर का धैर्य” अगर अनैतिकता या दूसरों को नुकसान पहुँचाने की मानसिकता में बदल जाए, तो यही तीन गुण व्यक्ति को सफलता की ओर ले जाने के बजाय बर्बादी की ओर ले जा सकते हैं। इसलिए इन रूपकों का सार उनके व्यवहार में नहीं, उनके पीछे छिपी मानसिक विशेषताओं में है। हमें जुआ नहीं चाहिए, हमें साहस चाहिए। हमें नशा नहीं चाहिए, हमें अनुशासित समर्पण चाहिए। हमें चोरी नहीं चाहिए, हमें अवसर को पहचानने और सही समय तक संयम रखने की क्षमता चाहिए।

दिलचस्प बात यह है कि धैर्य और self-control पर आधुनिक शोध स्वयं भी हमें सावधान करता है कि इन क्षमताओं को सरल सूत्रों में नहीं बाँधा जा सकता। प्रसिद्ध Marshmallow Test से जुड़ी शुरुआती धारणाओं को बाद के शोध ने काफी हद तक चुनौती दी है। 2024 के एक बड़े पुनर्विश्लेषण में बचपन में delay of gratification का प्रदर्शन वयस्क उपलब्धियों, स्वास्थ्य या व्यवहार का मजबूत स्वतंत्र पूर्वानुमानक नहीं पाया गया। इसका मतलब यह नहीं कि धैर्य या आत्म-नियंत्रण महत्वहीन हैं। इसका अर्थ यह है कि सफलता अनेक कारकों का परिणाम है—परिस्थितियाँ, अवसर, संसाधन, शिक्षा, सामाजिक समर्थन, निर्णय, कौशल, व्यक्तित्व और समय सभी मिलकर परिणाम बनाते हैं। इसलिए सफलता का कोई एक जादुई मानसिक सूत्र नहीं है।

फिर भी यदि उस मूल वाक्य को एक व्यावहारिक जीवन-दर्शन में बदलना हो, तो उसका अर्थ बेहद शक्तिशाली हो जाता है। जब अवसर आए तो डर के कारण पीछे मत हटो; लेकिन जोखिम को समझे बिना छलांग भी मत लगाओ। जब लक्ष्य चुनो तो कुछ समय के लिए उसे इतनी गंभीरता से लो कि रोज़ उस दिशा में काम करना तुम्हारी पहचान का हिस्सा बन जाए; लेकिन आवश्यकता पड़ने पर रणनीति बदलने का विवेक भी रखो। और जब परिणाम तुरंत न मिले तो घबराकर लक्ष्य मत बदलो; अपनी तैयारी जारी रखो, परिस्थितियों को पढ़ो और सही समय आने पर निर्णायक कदम उठाओ।

अंततः सफलता शायद उन लोगों को मिलती है जो एक साथ तीन विरोधाभासी गुणों को अपने भीतर विकसित कर लेते हैं—कदम उठाने का साहस, टिके रहने का अनुशासन और रुककर देखने का धैर्य। बहुत जल्दी जोखिम लेने वाला व्यक्ति खुद को जला सकता है। बहुत अधिक सावधान व्यक्ति अवसर खो सकता है। बहुत जल्दी हार मानने वाला कभी परिणाम तक नहीं पहुँचता। और बिना सोचे अंतहीन प्रतीक्षा करने वाला भी अवसर खो सकता है। असली महारत इन तीनों के बीच संतुलन बनाने में है।

इसलिए इस वाक्य को अगर एक पंक्ति में समझना हो तो शायद इसका सबसे सही अर्थ यह होगा: सफल होने के लिए जुआरी की तरह परिणाम की अनिश्चितता से मत डरो, शराबी की तरह अपने लक्ष्य से लगातार जुड़े रहो, और चोर की तरह सही क्षण को पहचानने तक अनावश्यक शोर मत करो। लेकिन इन तीनों से केवल उनका मानसिक गुण लो, उनकी विनाशकारी आदतें नहीं। क्योंकि सफलता अंततः जोखिम, जुनून और धैर्य के उस संगम से पैदा होती है जहाँ इंसान न तो डर के कारण रुकता है, न अधीरता के कारण टूटता है और न ही जल्दबाजी में अपनी सबसे बड़ी संभावना गंवाता है। वह काम करता है, सीखता है, इंतज़ार करता है और जब समय आता है—तो पूरी तैयारी के साथ आगे बढ़ता है।

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