कश्मकश तेरी यादों की
तेरी यादों की कश्मकश भी अजीब है,
भूलना चाहूँ तो तू और भी क़रीब है।
कश्मकश तेरी यादों की
दिल को हर रोज़ सताती है कश्मकश तेरी यादों की,
रात भर नींद चुराती है कश्मकश तेरी यादों की।
कभी बनकर धूप उतरती है सूनी आँखों में,
कभी बारिश बन के आती है कश्मकश तेरी यादों की।
मैंने चाहा कि तुझे दिल से भुला दूँ एक दिन,
फिर मुझे ख़ुद से मिलाती है कश्मकश तेरी यादों की।
एक ख़ुशबू-सी ठहर जाती है वीरान घर में,
बंद दरवाज़े खटखटाती है कश्मकश तेरी यादों की।
वक़्त कहता है कि अब लौट के आना नहीं है,
दिल को फिर राह दिखाती है कश्मकश तेरी यादों की।
तेरे जाने का ग़म अब भी कहीं बाकी है मगर,
मुस्कुराना भी सिखाती है कश्मकश तेरी यादों की।
चाँद खिड़की पे ठहरता है तो लगता है मुझे,
कोई चुपके से बुलाती है कश्मकश तेरी यादों की।
मैंने दुनिया की सभी राहों से मुँह मोड़ लिया,
मुझको मुझसे ही मिलाती है कश्मकश तेरी यादों की।
अब न शिकवा है कोई और न कोई शिकायत,
बस मुझे रोज़ बुलाती है कश्मकश तेरी यादों की।
कश्मकश तेरी यादों की
तेरी यादों से मेरा
रोज़ सामना होता है,
कभी आँखों में बारिश,
कभी दिल में धुआँ होता है।
मैं भूलना भी चाहूँ तो
भूल नहीं पाता तुझे,
हर ख़ामोशी के पीछे
तेरा ही नाम सुनाई देता है मुझे।
कभी लगता है
तू बस एक गुज़रा हुआ कल है,
फिर अचानक तेरी याद
मेरे आज में उतर आती है
और पूछती है—
“क्या सच में मुझे भुला दिया?”
तेरी यादों की गलियों में
आज भी मैं भटकता हूँ,
कुछ टूटे हुए ख़्वाबों को
अपनी हथेलियों पर रखता हूँ।
कभी तेरी हँसी याद आती है,
कभी तेरी नाराज़गी,
कभी वो छोटी-सी बात
जिसमें छुपी थी
पूरी ज़िंदगी की ख़ुशी।
अजीब है ये कश्मकश
तेरी यादों की—
न इन्हें पास रख सकता हूँ,
न इनसे दूर जा सकता हूँ।
रात जब चुपचाप उतरती है,
चाँद जब खिड़की पर ठहरता है,
मेरा अकेलापन
तेरा पता पूछता है
और दिल फिर से
तेरी राह तकता है।
मैंने कई बार
तेरी यादों की गठरी बाँधी,
सोचा—आज इसे
बहुत दूर फेंक आऊँगा।
लेकिन हर बार
वापस लौटते हुए पाया—
वो गठरी मेरे हाथ में नहीं,
मेरे दिल में बँधी थी।
कहते हैं वक़्त
हर दर्द को मिटा देता है,
मगर कुछ यादें ऐसी होती हैं
जो दर्द नहीं देतीं—
बस इंसान को
अंदर से थोड़ा ख़ामोश कर देती हैं।
अब तेरी याद आती है
तो मैं मुस्कुरा देता हूँ,
आँखें नम होती हैं
फिर भी उन्हें छुपा लेता हूँ।
शायद मोहब्बत का आख़िरी सच यही है—
इंसान किसी को खो देता है,
मगर उसकी यादों को
उम्र भर अपने भीतर
ज़िंदा रखता है।
और मैं भी
तेरी यादों की इसी कश्मकश में
आज तक ज़िंदा हूँ—
न तुझे अपना कह सकता हूँ,
न तुझे पराया कर सकता हूँ।
By Ajay Gautam
