सरकारी मत बनो इतना…
इतने भी सरकारी मत बन जाओ, सरकारी नौकरों,
कि सत्ता की चौखट पर झुकते-झुकते,
मानवता के अपराधी हो जाओ।
याद रखो—
तुम्हारी वर्दी का रंग,
किसी दल का नहीं,
भारत के संविधान का है।
तुम देश के लिए हो,
और देश किसी कुर्सी का नाम नहीं,
देश उन किसानों की साँसों में बसता है,
उन मजदूरों के पसीने में,
उन युवाओं के सपनों में,
जो अपने अधिकारों के लिए
सड़कों पर उतरते हैं।
जब निहत्थे हाथों पर लाठियाँ बरसती हैं,
तो सिर्फ़ शरीर नहीं टूटते,
लोकतंत्र का विश्वास भी घायल होता है।
घर लौटो तो इतना साहस बचाकर रखना,
कि अपने बच्चों की आँखों में
बिना झुके देख सको।
जब वे पूछें—
“पापा, आपने आज किसका साथ दिया था?
सत्ता का… या सत्य का?”
क्या उत्तर दोगे?
याद रखना,
पद की चमक क्षणिक होती है,
लेकिन अंतरात्मा का आईना
जीवन भर धुंधला नहीं होता।
ये तरक्की, ये तमगे, ये मैडल,
एक दिन अलमारी में धूल खाएँगे,
पर निर्दोषों की आहें
रातों की नींद चुरा लेंगी।
इतने भी सरकारी मत बनो, सरकारी नौकरों,
कि इंसानियत तुमसे शर्मिंदा हो जाए।
सरकारें बदलती रहती हैं,
लेकिन इतिहास हमेशा लिखता है—
किसने आदेश का पालन किया,
और किसने अपने विवेक का।
इसलिए वर्दी पहनना,
मगर विवेक उतारकर नहीं।
कर्तव्य निभाना,
मगर इंसानियत खोकर नहीं।
क्योंकि अंत में पहचान
सरकारी कर्मचारी की नहीं,
एक अच्छे इंसान की बचती है।
By Ajay Gautam
